ज़रा सोचो
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25 February, 2009
फूलों को साँस लेने दो
(‘स्लम डॉग मिलेनिअर’ फिल्म के ‘जय हो’ गीत के लिए
‘ऑस्कर २००९’ जितने वाले गुलजा़र साहब को सादर समर्पित.
‘फूलोंको साँस लेने दो’-यह रदीफ़ उन्ही की देन है।)
हटाओ काग़ज़ी घूँघट फूलों को साँस लेने दो
बदलती है खुशी करवट फूलों को साँस लेने दो
रहे वे मुस्कुराते तो मिलेंगी ज़िंदगी तुमको
बने ना दिल कभी मरघट फूलों को साँस लेने दो
तुम्हारे साथ गायेंगे,तुम्हारे साथ रोयेंगे
बडे़ अल्हड़,बडे़ नटखट फूलों को साँस लेने दो
हवाओ के लिफ़ाफे़ मे छुपा पैग़ाम खु़शबू का
ज़रा पलको के खोलो पट फूलोंको साँस लेने दो
इन्ही से जान लगती है मकानो मे,किवाडो़ मे
सजाते आपकी चौखट फूलोंको साँस लेने दो
लुभाती है अदा प्यारी...मगर मेरी ज़रा मानो
हटे रुख़्सार से ये लट फूलों को साँस लेने दो
जहाँ पर बाँसुरी बजती वहाँ ना बंदूके तानो
जमुनाजी का है ये तट फूलों को साँस लेने दो
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ग़ज़ल
21 May, 2008
रोटी के अजगर ने
रोटी के अजगर ने निगली हयात आधी
चबाली उसूलो ने बाकी हयात आधी
आज बाप को लटके देखा बेटी ने जब
दिल के दिल मे गयी लौटके बरात आधी
उसे मनाते पलके बोझल हुई चाँद की
करवट बदले रही जागती जो रात आधी
जुल्फे,रिश्ते,धरम,किताबे नाम कैद के
रिहा हुये तो हरदम पायी निज़ात आधी
भरी जवानी मे ये पड़ते कागज़ पीले
पढ़ते रहती टूटी फूटी दवात आधी
लगे अभी से रोने आँसू आप खून के
अभी सुनाई मैने तो वारदात आधी
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15 March, 2008
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